Monday, 22 August 2022

|| श्री गणेश जी चालीसा || Sri Ganesh ji Chalisa ||

|| श्री गणेश जी चालीसा ||

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जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥

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जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट सिर नयन विशाला॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥
एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।
अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥
गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥
शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥
गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर शनि तुहि भायो॥
कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥
नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहऊ॥
पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥
गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥
हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज सिर लाए॥
बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥
बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥
चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै गाई॥
मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुं कौन बिधि विनय तुम्हारी॥
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

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|| दोहा: ||

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान। 

नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥ 

सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश। 

पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥


॥ इति श्री गणेश जी चालीसा सम्पूर्ण ॥


Saturday, 20 August 2022

|| श्री मां दुर्गा चालीसा || Sri Maa Durga Chalisa ||


|| श्री माँ दुर्गा चालीसा || 

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ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते

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नमो नमो दुर्गे सुख करनी नमो नमो अंबे दुःख हरनी

निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूँ लोक फैली उजियारी 

शशि ललाट मुख महाविशाला ।  नेत्र लाल भृकुटि विकराला 
रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे 
तुम संसार शक्ति लै कीना  पालन हेतु अन्न धन दीना 
अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला 
प्रलयकाल सब नाशन हारी  तुम गौरी शिवशंकर प्यारी 
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें  
रूप सरस्वती को तुम धारा  दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा 
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भई फाड़कर खम्बा 
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो 
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं । श्री नारायण अंग समाहीं  
क्षीरसिन्धु में करत विलासा  दयासिन्धु दीजै मन आसा 
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित  जात बखानी 
मातंगी अरु धूमावति माता  भुवनेश्वरी बगला सुख दाता 
श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी  
केहरि वाहन सोह भवानी  लांगुर वीर चलत अगवानी 
कर में खप्पर खड्ग विराजै । जाको देख काल डर भाजै 
सोहै अस्त्र और त्रिशूला  जाते उठत शत्रु हिय शूला 
नगरकोट में तुम्हीं विराजत । तिहुँलोक में डंका बाजत  
शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे  रक्तबीज शंखन संहारे 
महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी 
रूप कराल कालिका धारा  सेन सहित तुम तिहि संहारा 
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भई सहाय मातु तुम तब तब  
अमरपुरी अरु बासव लोका  तब महिमा सब रहें अशोका 
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नरनारी 
प्रेम भक्ति से जो यश गावें  दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें 
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्ममरण ताकौ छुटि जाई  
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी  योग  हो बिन शक्ति तुम्हारी 
शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो 
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को  काहु काल नहिं सुमिरो तुमको 
शक्ति रूप का मरम  पायो । शक्ति गई तब मन पछितायो  
शरणागत हुई कीर्ति बखानी  जय जय जय जगदम्ब भवानी 
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा 
मोको मातु कष्ट अति घेरो  तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो 
आशा तृष्णा निपट सतावें । मोह मदादिक सब बिनशावें  
शत्रु नाश कीजै महारानी  सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी 
करो कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला 
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ  तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ 
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै । सब सुख भोग परमपद पावै 
देवीदास शरण निज जानी  कहु कृपा जगदम्ब भवानी 

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|| दोहा: ||

शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे नि:शंक ।

मैं आया तेरी शरण में, मातु लिजिये अंक 


॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥